Friday, April 9, 2010

इधर भी है, उधर भी...


अपनों की जुदाई, घरों में मातम
इधर भी है...उधर भी
आंखों में खामोशी, गुजरे वक्त का धुआं
इधर भी है, उधर भी
छाती पिटती बेवाओं का हूजूम, सूनी गोद की आकुलाहट
इधर भी है...उधर भी ....
बदहवास चेहरों पर ग़मगीनियत की झलक
एक ही जैसी तो है
ये मद किसका है????
सत्ता तू बड़ी ही छिनार है...
तू इधर भी है और उधर भी ।

Sunday, February 28, 2010

जोगीरा सारा रा रा....

गांव की होली की याद बड़ी आ रही है....ढोल की थाप के साथ घर-घर घुम के होली गाने की कसक दिल में उठ रही है। दिल्ली में बैठकर राजनीतिक जोगीरा गा कर होली मना रहा हूं..., ये जोगीरा आप भी गाईये...... सभी को होली की शुभकामनाएं.....

जोगीरा सारा रा रा.....जोगीरा सारा रा..रा..वाह जी वाह, वाह जोगीरा वाह
काले कोट और व्हाइट कॉलर में कौन बजट बनाया है, भईय़ा कौन बजट बनाया है
भूखे पेट जनता सूते, GDP में ग्रोथ पाया है...
चली जा देख चली जा..
प्रणव बाबू ने बजट बनाया, नया स्ट्रेटजी लाया है
धुक..धुक-- धुक..धुक चलेगी गाड़ी... तेल का दाम बढ़ाया है.
वाह जी वाह, वाह खिलाड़ी वाह

जोगीरा सारा रा रा रा रा...जोगीरा सारा रा रा
एक खेमा में दीदी रूसे, एक खेमा आडवानी
सत्ता पक्षे करूनानिधि मारे उल्टा बानी
रे फिर देख-देख हाय हाय हाय रे....

महंगाई ऐसी चीज है भाईया मुदई सौ बनाया है....
शरद पवार माथा पिटे, क्या खोया क्या पाया है।
देख चली जा देख चली जा.....चली जा देख चली जा

लोकतंत्र है कौन सी चिड़िया, कौन यार बनाया है
बढ़िया-बढ़िया बातों से किसने इसे सजाया है????
देख चली जा, चली जा.. देख चली जा
लोकतंत्र है जन का शासन, जनता ने बनाया है
रंग-बिरंगे चरित्तर वाले नेताओं से सजाया है
चली जा देख चली जा
वाह जी वाह, वाह खिलाड़ी वाह

जोगिरा सारा रा रा रारा...जोगिरा सारा रा रा रा रा
आख में चश्मा, हाथ में मोबाइल, भाषण है तुफानी
कौन सा ये प्राणी है भाईया बात करे जबानी ????
चली जा देख चली जा....
खदर का चमचम कुर्ता देख के, इतनी बात न जानीं
पैर में धूल ना हाथ में माटी, नेता है 'खानदानी'
ताक ताक ताक हाय हाय रे.....
जोगिरा सारा रा रा जोगिरा सारा रा रा
वाह खिलाड़ी वाह, वाह जोगिरा वाह

राजनीति का सूत्र बताओ, हूं लोफर लंफगा, भाई हूं लोफर लंफगा
एक बार में मंत्री बन जाऊ... जिंदगी हो जाए चगां, भाई जिंदगी हो जाए चंगा
देख चली जा, चली जा देख चली जा
राजनीति का मंत्र है सिखुआ.,...कहीं कराओ दंगा
फिर तुम राजा राजपाट के...बाकी कीट-पंतगा
रे.. फिर देख देख... हाय हाय रे.....

बुरा ना मानो होली है......

Sunday, February 21, 2010

ग़रीबी का बजट...एक कफ़न


संसद में बजट पेश होने वाला है..फिर से विकास दर का खाका रखा जाएगा और आम आदमी का हवाला देकर विपक्ष हंगामा मचाएगा। मेरी कुछ पसीजे हुए भाव.. सरकार के बजट के नाम।

सिंह साहेब के कोठी पर रात खूब जलसा था।
लखनऊ से बाई जी लोग आईं थीं।
पूरा जगरम था, खूब रेलम- पेलम था...
बुधना भी मस्त था, खूब कचरो-डभरो किया।

लेकिन देखो खेल तक़दीर का,
आज बुधना कोहार के घर भी मजमा लगा है,
गहमा - गहमी मची है ।
बुधना के घर जो भी नया रिश्तेदार जा रहा है,
दहाड़ फाड़ते हुए रोने की आवाज़ आ रही है।

दरोगा साहेब आए हैं, लाश ले जाने के लिए
क्योंकि बुधना अब नही रहा।
गले में फसरी लगा लिया था, निशान साफ- साफ है।

इधर दरोगा साहेब तुले हुए हैं, "ले चलो लाश का पंचनामा करना है"।
बुधना के माँई राग पकड़ पकड़ के रो रही है।
" काहें ले जा रहे हो इस ठठरी को
हड्डी का ढाचा ही तो बचा है, बस बोल नही रहा है, चल- फ़िर नहीं रहा।

पिछले आसाढ़ में मकई बोया था
पांच सौ बिगहा लगान पर, सोहिया- कोड़िया किया
लेकिन सब बर्बाद..
मकई के ठूठ में दाना नहीं, ठूंठे बचा था...
लड़की का इलाज करवाया
स्कूली खाना खाई के, अजलस्त पड़ गई थी।
दुहाई हो काली माई की, जम के मुंह से बची बिटिया

हामार बाबू,
अबगा के हड़िया, पातुकी, बर्तन माटी के बनाये थे .
लगन का दिन आ रहा है, बिक जायगा , पैसे आ जाएंगे,
लेकिन आन्ही- बरखा में
सब हेनक- बेनक हो गया .

और हुज़ूर,
लोग तो बियाह- शादी में रेडिमेड बर्तन में खाते- पीते हैं,
माटी का क्या काम?
साहू जी , सिंह साहेब के कर्जा तो और आफत,
पाहिले ही सिकम भर सूद चढा था,
पुरखा का ज़मीन रेहन पर चला गया.
और कर्जा, पापी पेट, जाहिल ज़िदंगी
बाबू हमर फसरी नहीं लगते तो और क्या करते .

Saturday, January 30, 2010

उपेक्षा के शिकार महात्मा...

भारत ने महात्मा गांधी की पुण्यतिथि मनाया है। आला नेताओं और अफसरशाहों ने अपने बेइमान दिल को मज़बूत करके नम आंखों से श्रद्धांजलि दी है। बेइमान लोग गांधी को श्रद्धांजलि देते वक्त डरते तो ज़रूर होंगे। लेकिन ये बात सोचता हूं तो हंसी आती हैं। दरअसल डर तो कब का खतम हो जाता है। गांधी के फोटो के सामने आत्मग्लानि इन अफसरशाहों की कब कि मर चुकी रहती है। क्योंकि गांधी के फोटो के आगे ही तो सारा गोरखधंधा होता है। फिर डर कैसा और आत्मग्लानि कैसी। भ्रष्टाचार का रगड़ से इनकी चमड़ी बेहद सख्त हो जाती है।
महात्मा का अंत कैसे हुआ ये सभी जानते हैं और किसने किया ये भी मालुम है। लेकिन मैं इसका विवरण देकर उस शख्स को अमर नहीं करना चाहता जिसने गांधी को मारा। लेकिन मुझे बार-बार उन ढोंगियों का जिक्र करना पड़ता है जो गांधी की खादी में छुपकर गांधीवाद का बलात्कार करते रहते हैं। अगर कोई गांधीवाद से इत्तेफाक नहीं रखता है तो इससे कोई शिकायत नहीं है। क्योंकि गांधीवाद एक विचारधारा है और विचारधारा सबकी एक हो ये मुमकिन भी नही है। लेकिन विचारधारा से ताल्लुक रखते हुए उसी के उपर नंगा नाच करना, ये शोभा नहीं देता। हमारे देश की अधिंकांश सरकारें या यूं कहें नेतागण गांधी के विचारों से बड़े ही प्रभावित नज़र आते हैं। उच्च कोटि की महंगी खादी कपड़े पहनते हैं औऱ अहिंसा कि बाते करते हैं। मोटे तौर पर अगर देखा जाए तो गांधी के रहते हुए भी और गांधी के इस दुनियां से चले जाने के बाद भी सियासत करने वाले उनकी बातों से तील मात्र भी इत्तेफाक नहीं रखे। हां, उन्होंने गांधी के चरित्र का जमकर उपयोग ज़रूर किया। गांधी को जनता के बीच अपनी हेठी बनाने के लिए उपयोग किया। राजनीति की धुरी पर गोल-गोल घुमते हुए वे गांधी को महान बताए, क्योंकि लोग गांधी को महान सुनना चाहते थे। गांधी को पथप्रदर्शक बताए, क्योंकि जनता चाहती थी कि नेता गांधी के बते रास्ते पर चलें। नि;संदेह गांधी जनता के प्रिय थे। लेकिन पॉलिटिकल लोगों के लिए मात्र साधन थे जिसे अपने साध्य पर वे साधते थे और कुछ नहीं। इतिहास में झांकता हूं तो गांधी लीगी और कांग्रेसियों में फंसे नज़र आते हैं। मृत्यु के बाद बड़े-बड़े अक्षरों में महिमा- मंडित नज़र आते हैं।
लेकिन गांधी की बातों पर हिंदुस्तान की सरकारों ने थोड़ा सा भी इल्म किया होता तो राज्यों की असमानता नहीं रहती। गांव और शहरों के बीच खाई नहीं पनपी होती। साल 1937 को 'हरिजन' में छपे एक लेख में गांधी ने कहा था कि "असली भारत इसके सात लाख गांवों में बसता है और विकास की गंगा गांवों से बहेगी तभी देश का निस्तार हो पाएगा।" लेकिन दुख है कि आजादी के बाद से ही बड़े-बड़े शहरों को कारोबारों से लैस किया जाने लगा। विकास की गंगा गांव से नहीं शहर से चल पड़ी। आज हम देख सकते हैं कि शहर से महज पचास मील बाहर निकलने पर लोग किस कदर बुनियादी सुविधा से महरूम हैं। गांवों में उद्योग नहीं होने के चलते शहर के तरफ पलायन हो रहा है।
किसानों के देश में ही किसान कहीं भूख से मर रहा है तो कहीं आत्महत्या करने के लिए मज़बूर हो रहा है। लोगों को 25 रुपया में सिम कार्ड मिल जा रहा है लेकिन 25 रुपया में भर पेट खाना नहीं मिल रहा। किसानों के लिए बीज की कीमतों की बात ही छोड़ दें। दो बिघा जमीन की जोत के लिए किसान कहां से पैसा जुटाता है, ये किसान ही जानता है। खाद से लेकर सिचाई का खर्चा उठाने के बाद पैदावार की उचित कीमत नहीं मिलने पर सरकारें उनके लिए कोई बेल-आउट पैकेज की घोषणा नहीं करती हैं। बस बयानबाजियां करके जमाखोरी को बढ़ावा देती हैं।
लेकिन जहां पर गांधी मार दिये गये हों...वहां कि हुकूमत से उनके विचारों की अपेक्षा करना बेमानी ही लगता है।

Tuesday, January 26, 2010

कौन सा गणतंत्र ?

भारत महान का मंत्र
हमरा सबसे बड़ गणतंत्र
ये नारा बंद करो भाई......
काहे का गणतंत्र मना रहे हो? क्या तुम्हारी आंखे अंधी हो चुकी हैं? क्या तुम्हारी चेतनाओं ने महसूस करना छोड़ दिया है? क्या वर्चुअल लाइफ के आगोश में इतने मशगुल हो गए हो कि तुमने ये भी सोचना छोड़ दिया है कि तुम्हारे इतिहास के साथ क्या बर्ताव हुआ है और तुम्हारे भविष्य़ को क्या मोड़ दिया जा रहा है। मैं एक बार फिर से याद दिलाना चाहुंगा, उस संविधान को जो साठ साल पहले लिखा गया था। उसका क्या कहीं अता पता है? इंडिया इज ए सेक्युलर, सोशलिस्ट, रिपब्लिक एंड डेमोक्रेटिक कंट्री। क्या इन शब्दों को कहीं भी देश के किसी भी कोने में पाते हो? नहीं, हरगिज नहीं। कैडबरी और रॉल्स रॉयल की दुनिया से निकलो तो पता चलेगा कि देश की कितनी बड़ी आबादी एक रोटी के टुकड़े के लिए दिन-रात संघर्ष कर रही है। मीलों दूरी तय करने के लिए अपने जख्मी पैरों की तरफ एक निगाह देख भी नहीं रहा है। मेरे देश वासियों मैक-डॉनल्ड और केएफसी के चमकादार शीशों से बाहर भी तो झांको तो पता चले कि हमारे देश के किसान किस गुरबत में जिंदगी बिता रहे हैं। एक किसान की सबसे बड़ी जागीर, उसकी सल्तनत, उसका मान-अभिमान खेत होता है। जब उन खेतों में बीज डालता है, तो अपने घर में बधाईयां बजवाता है। आज उन घरों में बधाईयां बजनी बंद हो चुकी हैं। खेत सुने पड़े हैं और उनके चेहरे भी सूने पड़े हैं। ऊंची झतों से जरा नीचे तो देखों। ये तुम्हारे इंदिरा आवास योजना की उगाही किसी महल वाले की दिवार में संगमरमर फिट करने का काम कर रही है। रोज की जिंदगी को जीडीपी की कसौटी पर नही परखा जा सकता है। सच्चाई बिल्कुल अलग है।
18 साल से ऊपर के लोग क्यों भूल जाते हैं कि पैसे का दम-खम दिखाकर कैसे राजनीति हो रही है। सत्ता के दहलीज पर पहुंचने के लिए किस कदर के दांव-पेंच का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या कभी देखा है कि बिना पैसे वाला आदमी चुनाव लड़ रहा हो? जनाधार भी पैसे पर बनने लगे हैं। फिर अफरात पैसे के दम पर हो रही चुनावी प्रक्रीया को कैसे जनता का चुनाव मान रहे हो। 20 फीसदी वोट पाकर सत्ता हासिल करने वाले को कैसे जनता की सरकार कह सकते हो?
ओछी राजनीति के डकैतों को कोई भी सरकार सलाखों के पीछे नहीं घुसा पाई, ये क्यों नहीं सोच रहे हो? जिनके जंगल उन्हीं को लूट लिया गया। उन्हीं के धन-संपदा पर कितने अधिकारी करोड़ों के महल पिटवा लिये। ये क्यों नहीं देखते हो? क्यों सिर्फ ऑपरेशन कोबरा को देख रहे हो? उनकी छाती में धधकते असंतोष को क्यों नहीं भांपते हो? दोस्तों आज भी लोग नौकरशाही का थप्पड़ खा रहे हैं। आज भी पुलिस की लाठियां खा रहे हैं। आज भी जाति और मजहब के नाम पर भेद किया जा रहा है। क्षेत्रवाद का बोलबाला है। आधे से अधिक राज्य में नागरिक संविधान से इत्तेफाक नहीं रखते। लिहाजा उनका रेड-कॉरिडोर जोन बढ़ता जा रहा है। ये बात मस्तिष्क में हलचल क्यों नहीं पैदा कर रहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है? पहले सांमतों के कोल्हू में आम जन पिसते थे अब इन तथाकथित नेताओं और माफियाओं के कोल्हू में पिस रहा है। जान-बूझकर अनजान बना हुआ है भारत। खोए हुए भारत का गौरव अभी वापस नहीं लौटा है। अपने भाईयों को अपने बेटों को, अपने दोस्तों को बताओं कि हमारा भारत अभी महान नहीं हुआ है। इसे महान बनाना है।

Sunday, January 24, 2010

मैं जोगी हूं पुजारी नहीं


मैं जोगी हूं पुजारी नहीं। पुजारी पूजा करना छोड़ सकता है। फेंक सकता है उस पीले लिबास को जिसे ओढ़ के वो तुम्हारे भगवान की अराधना करता है। क्योंकि उसकी अराधना से उसका पेट भरता है। जिस दिन उसे अगाध धन का स्रोत कहीं और से मिल जाएगा, ऐश्वर्य के दूसरे साधन मिल जाएंगे वो मूरत की अराधना छोड़ सकता है। लेकिन एक जोगी लाल-पीले स्वच्छ कपड़े पहने कर फूल नहीं चढ़ाता। रटे-रटाए भजन- बोल कह कर क्रियाकलाप पूरा नहीं करता। इसलिए कहता हूं, मैं जोगी हूं। मेरी साधना ही सब कुछ है। मन की फकीरी ने ये रौब दिया है। आसानी से नहीं जाने वाला। फकीर की फकीरी मरने के बाद ही जाती है। ये अंदाज तभी महसूस किया था, जब तुम्हारी जोग लगी थी मुझको। मेरे लबों पे आने वाला हर भजन- गीत मेरे दिल के कुंड की एक बुंदें हैं। जो शबनम बनके जहन में इकठ्ठा होती हैं और बरबस ही लयबद्ध होकर बाहर आने लगती हैं। मेरे जोग से ना तो पेट की लालच है..और ना ही ऐश्वर्य की दिली तमन्ना है। ये सभी चीजें छूट चुकी हैं इसलिए तो ये जोग लगा है। अगर ये सब कुछ चाहता तो मैं पुजारी होता और तुम्हारी बुत-परस्ती करता। मैं जोगी हूं, जो तुम्हारी आत्मा तक पहुंचना चाहता हूं।

Monday, January 11, 2010

तमन्ना...



दिल में ढेरों अरमां हैं
मीठे से, सहमें से...
नये साल में सोचता हूं बांट दूं सभी के सभी ---
जब घना कोहरा हो..तो धूप बन बिखर जाऊं
ताप से तड़फड़ाती धरती पर बूंद बन बिखर जाऊं
और...
जिंदगी जब सर्द हो जाए,
विचारों के अंकुर पर बर्फ जम जाए
तो अपने ऐहसासों की गर्माहट दू, ताकि
बर्फ पिघल जाए...विचार वृक्ष बन जाए।।